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उदित मिश्रा लिखते हैं: कॉर्पोरेट इंडिया के सेल्स डेटा में, GDP ग्रोथ पर सवाल उठने का एक और कारण

Economy  •  👁 18 views  •  24 Jan 2026
उदित मिश्रा लिखते हैं: कॉर्पोरेट इंडिया के सेल्स डेटा में, GDP ग्रोथ पर सवाल उठने का एक और कारण
यह हालिया विश्लेषण उदित मिश्रा के द्वारा लिखा गया एक महत्वपूर्ण लेख है जिसमें उन्होंने कॉर्पोरेट इंडिया के सेल्स डेटा (निवल बिक्री वृद्धि) और सरकारी GDP वृद्धि के आंकड़ों के बीच पाई जा रही असमानता पर गहरा सवाल उठाया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि क्या वास्तव में भारत की अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत है जितना आधिकारिक GDP आंकड़े दिखाते हैं, या कहीं आंकड़ों की सच्चाई और वास्तविकता में फर्क तो नहीं है।
सबसे पहले सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में भारत की GDP वृद्धि दर लगभग 8% (नाममात्र) और 7.4% (वास्तविक) बताई जा रही है, जो अपेक्षाकृत मजबूत वृद्धि का संकेत देती है। इन अनुमानों को पढ़ने पर सामान्य तौर पर लगता है कि अर्थव्यवस्था स्वस्थ गति से आगे बढ़ रही है।
लेकिन मिश्रा का तर्क यह है कि अगर देश की अर्थव्यवस्था वाकई इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो कॉर्पोरेट इंडिया के बड़े कंपनियों—जो देश की GDP में एक बड़ा योगदान रखते हैं—की नेट सेल्स (कुल बिक्री) वृद्धि दर भी GDP की वृद्धि के समान या उससे तेज़ होनी चाहिए थी। डेटा दिखाता है कि निरंतर पाँच क्वार्टर के दौरान कॉर्पोरेट कंपनियों की बिक्री की वृद्धि GDP वृद्धि की तुलना में काफी कम रही है। उदाहरण के लिए दिसंबर 2024 तिमाही में GDP का नाममात्र वृद्धि लगभग 10.3% थी, जबकि कंपनियों की बिक्री मात्र 6.2% बढ़ी थी। इसी तरह मार्च और जून 2025 में भी बिक्री वृद्धि GDP के मुकाबले पीछे रही।
इस अंतर का मतलब यह है कि वास्तविक आर्थिक गतिविधियाँ—जैसे कंज्यूमर डिमांड, उत्पादन और कॉर्पोरेट सेवाओं की बिक्री—वैसे तेजी से बढ़ नहीं रहीं, जैसा GDP वृद्धि दर से लगता है। इससे आर्थिक वृद्धि के विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, खासकर जब निवेशक, नीति निर्माता और आम जनता अर्थव्यवस्था की “हकीकत” समझना चाहते हैं।
विश्लेषण में यह भी सुझाव दिया गया है कि GDP आंकड़े अधिक व्यापक हैं और कई क्षेत्रों—जैसे सरकारी खर्च, कृषि या सेवा—के प्रदर्शन को शामिल करते हैं, लेकिन कॉर्पोरेट सेल्स डेटा सीधे वास्तविक आर्थिक क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष संकेत देता है। अगर बड़ी कंपनियों की बिक्री धीमी बढ़ रही है, तो GDP की मजबूत वृद्धि का कारण केवल आंकड़े या नई माप पद्धतियाँ भी हो सकती हैं, न कि अर्थव्यवस्था का वास्तविक विस्तार।
कुल मिलाकर, मिश्रा की यह पेशकश दर्शाती है कि GDP डेटा की प्रामाणिकता और आर्थिक वास्तविकता के बीच अंतर समझने के लिए और अधिक गहन विश्लेषण की आवश्यकता है।