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नियम-आधारित व्यवस्था की दरारें: सुधार ही भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने का एकमात्र रास्ता

Economy  •  👁 11 views  •  27 Jan 2026
नियम-आधारित व्यवस्था की दरारें: सुधार ही भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने का एकमात्र रास्ता
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। बीते दशकों में जिस नियम-आधारित व्यवस्था ने आर्थिक स्थिरता, पारदर्शिता और निवेशकों का भरोसा कायम किया था, वह अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है। नीतिगत अनिश्चितता, बार-बार बदलते नियम और संस्थागत स्वायत्तता पर उठते सवाल इस व्यवस्था को चरमराने का संकेत दे रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों की राय है कि केवल गहरे और संरचनात्मक सुधार ही भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक रूप से बचा सकते हैं।
नियम-आधारित व्यवस्था का अर्थ है—स्पष्ट कानून, समान रूप से लागू नियम और स्वतंत्र संस्थान। जब ये तत्व कमजोर होते हैं, तो निवेश प्रभावित होता है, कारोबारी फैसलों में डर बढ़ता है और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने लगती है। हाल के वर्षों में टैक्स विवाद, नियामक संस्थाओं की भूमिका और नीति क्रियान्वयन में असंगति जैसे मुद्दे इसी चिंता को रेखांकित करते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने रोजगार सृजन, निजी निवेश में सुस्ती और आय असमानता जैसी गंभीर चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। ऐसे माहौल में अगर नियमों पर भरोसा कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशक और घरेलू उद्यमी दोनों ही सतर्क हो जाते हैं। इसका सीधा असर विकास दर और सामाजिक स्थिरता पर पड़ता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सुधारों की दिशा स्पष्ट होनी चाहिए। कर प्रणाली को सरल और स्थिर बनाना, न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना, नियामक संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करना और श्रम व भूमि सुधारों को आगे बढ़ाना समय की मांग है। साथ ही, नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता बेहद जरूरी है।
भारत की आर्थिक क्षमता विशाल है, लेकिन उसे साकार करने के लिए भरोसेमंद व्यवस्था की जरूरत है। जैसे-जैसे नियम-आधारित ढांचा कमजोर पड़ रहा है, सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं। मजबूत सुधार ही भारतीय अर्थव्यवस्था को अस्थिरता से निकालकर सतत विकास के रास्ते पर ले जा सकते हैं।