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डिकोड पॉलिटिक्स: DMK बनाम NDA को ‘आर्यन-द्रविड़ संघर्ष’ बताकर स्टालिन क्या साधना चाहते हैं?

Politics  •  👁 12 views  •  27 Jan 2026
डिकोड पॉलिटिक्स: DMK बनाम NDA को ‘आर्यन-द्रविड़ संघर्ष’ बताकर स्टालिन क्या साधना चाहते हैं?
तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ती दिख रही है। मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने हालिया चुनावी भाषणों में DMK बनाम NDA की लड़ाई को “आर्यन बनाम द्रविड़” संघर्ष के रूप में पेश किया है। यह बयान केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में गहराई से जुड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बहस को फिर से केंद्र में लाने की रणनीति है।
द्रविड़ आंदोलन की जड़ें 20वीं सदी की शुरुआत में पेरियार ई.वी. रामासामी के विचारों से जुड़ी हैं, जो ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और उत्तर भारतीय वर्चस्व के खिलाफ खड़ा हुआ था। डीएमके इसी विचारधारा की राजनीतिक विरासत मानी जाती है। जब स्टालिन ‘आर्यन’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उनका संकेत उस राजनीति की ओर होता है, जिसे वे हिंदी थोपने, सांस्कृतिक एकरूपता और केंद्र के बढ़ते हस्तक्षेप से जोड़ते हैं।
एनडीए, खासकर भाजपा, को डीएमके अक्सर उत्तर भारत केंद्रित और सांस्कृतिक रूप से ‘आर्यन’ विचारधारा का प्रतिनिधि बताती रही है। इस फ्रेमिंग के जरिए स्टालिन तमिल पहचान, भाषा, सामाजिक न्याय और संघीय ढांचे की रक्षा को चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं। यह रणनीति तमिलनाडु में भावनात्मक रूप से असरदार मानी जाती है, जहां द्रविड़ अस्मिता राजनीति का मजबूत आधार रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ‘आर्यन-द्रविड़’ नैरेटिव का मकसद केवल वैचारिक संघर्ष दिखाना नहीं, बल्कि चुनाव को दिल्ली बनाम तमिलनाडु की लड़ाई में बदलना है। इससे डीएमके को क्षेत्रीय स्वाभिमान का रक्षक और एनडीए को बाहरी ताकत के रूप में पेश करने में मदद मिलती है।
हालांकि आलोचक इसे समाज को बांटने वाला विमर्श मानते हैं और सवाल उठाते हैं कि क्या यह पुरानी बहस आज के विकास और रोजगार जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाती है। फिर भी, चुनावी राजनीति में स्टालिन का यह दांव साफ संकेत देता है कि पहचान और विचारधारा तमिलनाडु की सियासत में अब भी निर्णायक भूमिका निभा रही है।