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राइटर कॉर्नर: तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध का ब्रिटिश सैनिक का ब्यौरा, 1790 के दशक के बेंगलुरु की अनदेखी तस्वीर

National  •  👁 5 views  •  07 Jan 2026
राइटर कॉर्नर: तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध का ब्रिटिश सैनिक का ब्यौरा, 1790 के दशक के बेंगलुरु की अनदेखी तस्वीर
तीसरा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1790–1792) भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस युद्ध से जुड़ा एक ब्रिटिश सैनिक का व्यक्तिगत ब्यौरा आज हमें न केवल सैन्य घटनाओं की जानकारी देता है, बल्कि 1790 के दशक के बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों की सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक झलक भी दिखाता है। यही कारण है कि यह दस्तावेज़ इतिहास के “राइटर कॉर्नर” में खास महत्व रखता है।
ब्रिटिश सैनिक ने अपने संस्मरणों में तत्कालीन बेंगलुरु को एक रणनीतिक सैन्य ठिकाने के रूप में वर्णित किया है। उसके अनुसार, यह क्षेत्र घने जंगलों, कच्ची सड़कों और छोटे-छोटे गांवों से घिरा हुआ था। शहर में किले, पानी के तालाब और स्थानीय बाजार जीवन के केंद्र हुआ करते थे। सैनिक के विवरण से यह भी पता चलता है कि स्थानीय आबादी किस तरह युद्ध के बीच अपने दैनिक जीवन को संभालने की कोशिश कर रही थी।
इस ब्यौरे में मैसूर की सेना और टीपू सुल्तान के प्रभाव का भी उल्लेख मिलता है। ब्रिटिश सैनिक ने लिखा है कि टीपू की सेना अनुशासित और स्थानीय भूगोल से भली-भांति परिचित थी, जिससे ब्रिटिश टुकड़ियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही उसने स्थानीय लोगों के साहस और संघर्षशीलता का भी वर्णन किया है।
इतिहासकारों के अनुसार, ऐसे व्यक्तिगत संस्मरण आधिकारिक रिकॉर्ड से अलग एक मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन और शहरों की पहचान को भी बदल देता है।
तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध पर आधारित यह ब्रिटिश सैनिक का ब्यौरा आज के बेंगलुरु को समझने में मदद करता है—एक ऐसा शहर, जो कभी युद्ध और साम्राज्यवादी संघर्षों का साक्षी रहा और आज आधुनिक भारत के प्रमुख महानगरों में शामिल है।