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चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत अंतर्विषयक सहयोग की आवश्यकता : प्रो. रविचंद्रन वी. कुलपति

Education   •   👁 85 views   •   26 Mar 2026
चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत अंतर्विषयक सहयोग की आवश्यकता : प्रो. रविचंद्रन वी. कुलपति
दिल्ली फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी (डीपीएसआरयू) और अक्षय कृषि परिवार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित “भूमि सुपोषण संगोष्ठी” में देशभर के प्रमुख वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस संगोष्ठी का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य, मानव कल्याण और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच महत्वपूर्ण संबंधों पर विचार-विमर्श करना था। “वन हेल्थ के लिए भूमि सुपोषण: विकसित भारत की आधारशिला” विषय पर केंद्रित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में मृदा की उर्वरता की पुनर्स्थापना को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. रविचंद्रन वी. ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्यद्वारा संयुक्त रूप से आयोजित “भूमि सुपोषण संगोष्ठी” में देशभर के प्रमुख वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस संगोष्ठी का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य, मानव कल्याण और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच महत्वपूर्ण संबंधों पर विचार-विमर्श करना था। “वन हेल्थ के लिए भूमि सुपोषण: विकसित भारत की आधारशिला” विषय पर केंद्रित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में मृदा की उर्वरता की पुनर्स्थापना को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

उद्घाटन सत्र में कुलपति प्रो. रविचंद्रन वी. ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य विज्ञान और कृषि के बीच मजबूत अंतर्विषयक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि कुलसचिव डॉ. आर.सी. खत्री ने मृदा स्वास्थ्य, मानव कल्याण और सतत विकास के समन्वित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिनमें प्रो. पी. के. प्रजापति (अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान), श्री आलोक कुमार गुप्ता (अक्षय कृषि परिवार), प्रो. शिल्पी शर्मा (आईआईटी दिल्ली), डॉ. साबू थॉमस (केरल), प्रो. उर्मि बाजपेयी (दिल्ली विश्वविद्यालय), डॉ. मीनाक्षी ग्रोवर (आईसीएआर-आईएआरआई), डॉ. कुमार प्रणव (जेएनयू), डॉ. मौमिता श्रीवास्तव (आरजीसीबी), प्रो. राजीव दास गुप्ता (जेएनयू), डॉ. बी. रामकृष्णन (आईएआरआई), डॉ. शुभम यादव (आईपीएफटी), डॉ. राजेश कुमार और डॉ. सुकीर्ती (सीसीएस हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय), तथा प्रो. आनंदरामन शर्मा पी.वी. (अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान) शामिल रहे। इसके अलावा डॉ. राज के. शिरुमल्ला (BIRAC), डॉ. आलोक के. श्रीवास्तव (ICAR-NBAIM) और डॉ. बलराज सिंह (पूर्व कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर) जैसे विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए।

संगोष्ठी में “स्वस्थ मृदा – स्वस्थ भोजन – स्वस्थ मानव” के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए बताया गया कि मृदा स्वास्थ्य केवल कृषि का विषय नहीं है, बल्कि यह निवारक स्वास्थ्य देखभाल और पारिस्थितिक संतुलन का आधार भी है। विशेषज्ञों ने “पोषणीय क्षरण” (Nutritional Dilution) की बढ़ती समस्या पर चिंता व्यक्त की, जिसमें मृदा की गुणवत्ता में गिरावट के कारण खाद्य पदार्थों के पोषण स्तर और जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

मुख्य सत्रों में उभरते “वन हेल्थ” दृष्टिकोण पर चर्चा की गई, जिसमें मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य प्रणालियों के एकीकरण पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने मृदा माइक्रोबायोम की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि यह फसलों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पोषण सुधारने और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से निपटने में सहायक है। साथ ही रासायनिक-आधारित खेती से माइक्रोबायोम-आधारित कृषि की ओर संक्रमण तथा बायोस्टिमुलेंट्स और सतत कृषि इनपुट्स के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई गई।

संगोष्ठी में जलवायु अनुकूलन के व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें सूखा-प्रवण फसलों के लिए माइक्रोबियल कंसोर्टिया और क्षतिग्रस्त भूमि के पुनर्स्थापन हेतु फाइटोरिमेडिएशन तकनीकों पर चर्चा शामिल रही। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक संस्थानों, कृषि संगठनों और नीति-निर्माताओं के बीच मजबूत सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि अनुसंधान को जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।

एक उच्च स्तरीय पूर्ण सत्र में बहु-संस्थागत साझेदारी और नीति एकीकरण के महत्व को रेखांकित किया गया, जिससे सतत प्रथाओं को देशभर में व्यापक स्तर पर लागू किया जा सके। इस कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया गया और विद्यार्थियों से “मृदा दूत” के रूप में समाज में जागरूकता फैलाने का आह्वान किया गया।

संगोष्ठी का समापन एक सामूहिक संकल्प के साथ हुआ, जिसमें मृदा संरक्षण और “वन हेल्थ” ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई। इसके अंतर्गत एनएसएस और रोटरी क्लबों के सहयोग से विभिन्न संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनका समापन 22 अप्रैल 2026 (पृथ्वी दिवस) को एक विशेष आयोजन के साथ होगा।

भूमि सुपोषण संगोष्ठी 2026 ने यह संदेश सशक्त रूप से प्रस्तुत किया कि मृदा स्वास्थ्य की बहाली केवल कृषि के लिए ही नहीं, बल्कि देश के दीर्घकालिक स्वास्थ्य, पोषण और समृद्धि के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।