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देवदत्त पटनायक: रूपकों के ज़रिये प्राचीन भारत की सांस्कृतिक गुत्थियाँ उद्घाटित होती हैं

National  •  👁 7 views  •  31 Jan 2026
देवदत्त पटनायक: रूपकों के ज़रिये प्राचीन भारत की सांस्कृतिक गुत्थियाँ उद्घाटित होती हैं
नई दिल्ली: प्रसिद्ध मिथक‑विशेषज्ञ देवदत्त पटनायक ने एक लेख में बताया है कि रूपक (metaphor) कैसे प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और दार्शनिक गूढ़ताओं को समझने का एक शक्तिशाली तरीका थे। पटनायक कहते हैं कि प्राचीन कवियों ने सीधे दार्शनिक वाक्यों के बजाय प्राकृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके मानवीय अनुभव, मनोवैज्ञानिक भावनाएँ और जीवन की रहस्यात्मक समझ व्यक्त की।
लेख के अनुसार, प्रारंभिक भारतीय रूपक तीन भिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों—वैदिक उत्तर‑पश्चिम, तमिल दक्षिण, और प्राकृत‑भाषी देकkan—से उभरते हैं, और प्रत्येक क्षेत्र का अपना रूपक‑भाषा‑शैली है जो वहाँ की प्राकृतिक दुनिया, सामाजिक जीवन और भावनात्मक दुनिया को दर्शाती है।
वैदिक कवियों ने सarasvati जैसी नदी को ध्वनि‑मयी माता के रूप में वर्णित किया, जो प्रकृति की विशालता और मानवीय छोटेपन के बीच संबंध को दर्शाती है। इसी तरह सूर्योदय को युवती की तरह दिखाकर दिन की शुरुआत और आशा की अनुभूति को महसूस कराया गया।
दक्षिण भारत के संगम कवियों ने पांच पारिस्थितिक इलाकों—पहाड़ (कुरिंजी), वन (मुल्लै), खेत (मरुधम), तट (नेयथल) और रेगिस्तान (पलाई)—का इस्तेमाल कर भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त किया। उदाहरण के लिए, समुद्र के restless लहरों का प्रतीक लंबी प्रतीक्षा और तड़प के रूप में दिखाया गया है।
देकkan के प्राकृत कवियों ने शहरी‑उद्यान परिवेश में रूपक का उपयोग किया—उद्यानों के बीच कमल‑तालाब में प्रेमियों की छिपी मुलाक़ातों को भावनात्मक बिंबों के रूप में पिरोया। यहाँ मानव‑प्रकृति संबंध अधिक अन्तरंग और सामाजिक रूप से जुड़ा दिखता है।
पटनायक की यह व्याख्या बताती है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में रूपक सिर्फ शिल्प‑कौशल नहीं थे, बल्कि जीवन, भावना और प्रकृति के बीच गूढ़ संबंधों को समझने का एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध तरीका थे—जो दर्शन से पहले ही काव्यात्मक भाषा में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को बयान कर देते थे।