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गांधी और अंबेडकर के बीच टकराव: चुनाव क्षेत्र, धर्म और न्याय की दृष्टि से अलग मत

National  •  👁 6 views  •  30 Jan 2026
गांधी और अंबेडकर के बीच टकराव: चुनाव क्षेत्र, धर्म और न्याय की दृष्टि से अलग मत
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण के दौर में दो महान विचारकों महात्मा गांधी और डॉ. बी. आर. अंबेडकर के बीच कई मुद्दों पर विचारों का टकराव रहा। यह टकराव केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, धर्म और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे गहरे मुद्दों पर आधारित था।
एक प्रमुख टकराव का विषय था अलग-अलग चुनाव क्षेत्र (Separate Electorates)। गांधी जी का मानना था कि अलग वोटिंग व्यवस्था हिंदू समाज को और विभाजित करेगी और सामाजिक एकता को कमजोर करेगी। वहीं अंबेडकर का तर्क था कि अलग निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जातियों को स्वतंत्र और सुरक्षित प्रतिनिधित्व देंगे, क्योंकि सामान्य निर्वाचन प्रणाली में वे उच्च जातियों के प्रभाव में दब जाते। इस पर गांधी जी ने 1932 में पूना आंदोलन (अन्ना हजारे के समय) के दौरान भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया, जिससे अंबेडकर और उनके समर्थकों के बीच तनाव बढ़ा।
धर्म और समाज पर दृष्टिकोण में भी दोनों के मतभेद थे। गांधी जी ने हिंदू धर्म के सुधारवादी दृष्टिकोण से अनुसूचित जातियों के उत्थान का समर्थन किया, लेकिन वे धर्म की एकता और पारंपरिक संरचना को बचाए रखना चाहते थे। अंबेडकर ने इसे पर्याप्त नहीं माना और उन्होंने हिंदू धर्म को जातिवाद और सामाजिक भेदभाव का स्रोत बताते हुए बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया।
न्याय और सामाजिक अधिकारों के संदर्भ में भी मतभेद स्पष्ट थे। गांधी जी ने नैतिक और आदर्शवादी दृष्टिकोण से सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से सामाजिक न्याय पर जोर दिया, जबकि अंबेडकर ने सामाजिक और कानूनी सुधार के माध्यम से संरचनात्मक न्याय को प्राथमिकता दी।
इन मतभेदों के बावजूद दोनों ने भारत में अनुसूचित जातियों के अधिकार और समाज सुधार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका टकराव दर्शाता है कि सत्य और न्याय की अवधारणाएं व्यक्ति और दृष्टिकोण पर निर्भर कर सकती हैं, और लोकतांत्रिक बहस में विभिन्न मत होना सामान्य है।