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दावोस में मार्क कार्ने ने कहा पुरानी वैश्विक व्यवस्था खत्म, भारत को नई दुनिया के लिए ये तैयारियाँ आवश्यक

National  •  👁 11 views  •  27 Jan 2026
दावोस में मार्क कार्ने ने कहा पुरानी वैश्विक व्यवस्था खत्म, भारत को नई दुनिया के लिए ये तैयारियाँ आवश्यक
दावोस (WEF 2026) में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्ने ने वैश्विक राजनीति और आर्थिक व्यवस्था पर एक चिंतात्मक संदेश दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि पुरानी “नियम‑आधारित” अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब लौटने वाली नहीं है और दुनिया एक नई, अधिक संघर्षरत और विभाजित वैश्विक क्रम की ओर बढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अब महाशक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है और शक्तिशाली देश अपने हितों के लिए आर्थिक एकीकरण, टैरिफ और आपूर्ति श्रृंखला को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे समय में दुनिया को एक नए, साझा मूल्यों और हितों पर आधारित क्रम की आवश्यकता है, जिसमें मध्य‑शक्ति देश (middle powers) जैसे कनाडा, मिलकर एक स्थिर और अधिक सहयोगात्मक वैश्विक ढांचा तैयार करें।
भारत के लिए यह परिप्रेक्ष्य अवसर और चुनौती दोनों है। एक ओर, भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही है और देश वैश्विक आपूर्ति‑शृंखलाओं में विश्वसनीय भागीदार के रूप में उभर रहा है। भारतीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, AI और स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्यों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है, जिससे देश नई व्यवस्था के आर्थिक अवसरों को भुनाने के लिए बेहतर स्थिति में है।
दूसरी ओर, नई व्यवस्था में राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियाँ भी स्पष्ट हैं। जैसा कि वैश्विक बहुपक्षवाद और अलग‑अलग शक्तियों के दृष्टिकोण अब उभर रहे हैं, भारत को “बहु‑ध्रुवीय संतुलन” बनाना होगा — अपने सहयोग को मजबूत करते हुए अमेरिका‑यूरोप, ब्रिक्स और दक्षिण‑दक्षिण साझेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना ज़रूरी होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत को तीन प्रमुख क्षेत्रों में तैयार रहना चाहिए —
आर्थिक मजबूती: निरंतर निवेश, विनिर्माण क्षमता, सेवाओं और AI‑उद्योग में वैश्विक योगदान बढ़ाना।
कूटनीतिक रणनीति: नियम‑आधारित पुरानी व्यवस्था पर न केवल भरोसा बल्कि साझा हितों पर आधारित गठबंधन विकसित करना।
आंतरिक क्षमता निर्माण: डिजिटल‑इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों पर ध्यान देना ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत अधिक सक्षम हो सके।
इस प्रकार, नई वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका सिर्फ अवसर खोजने की नहीं बल्कि नेतृत्व देने की भी है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग और घरेलू क्षमता के संतुलन के साथ खुद को प्रतिस्थापित करे।