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बद्रीनाथ–केदारनाथ में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर संभावित रोक: आस्था, परंपरा और संविधान के बीच बहस

National  •  👁 10 views  •  27 Jan 2026
बद्रीनाथ–केदारनाथ में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर संभावित रोक: आस्था, परंपरा और संविधान के बीच बहस
उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दोनों प्रमुख हिंदू तीर्थस्थलों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग तेज़ हुई है। इस प्रस्ताव को कुछ धार्मिक संगठनों और साधु-संतों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन समाज के कई वर्ग और विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। नतीजतन, यह मुद्दा आस्था, परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के टकराव का केंद्र बन गया है।
समर्थकों का तर्क है कि बद्रीनाथ और केदारनाथ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और आध्यात्मिक साधना के केंद्र हैं। उनका कहना है कि मंदिरों की पवित्रता, रीति-रिवाजों और धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए यह जरूरी है कि यहां केवल हिंदू श्रद्धालुओं को ही प्रवेश दिया जाए। कुछ लोग हाल के वर्षों में धार्मिक स्थलों पर अनुशासनहीनता और आस्था से जुड़े विवादों का हवाला भी देते हैं।
वहीं, विरोध करने वालों का कहना है कि यह कदम भेदभावपूर्ण हो सकता है और भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की भावना के खिलाफ जाता है। उनका तर्क है कि देश में कई प्रमुख मंदिर और धार्मिक स्थल ऐसे हैं, जहां आस्था और दर्शन के लिए धर्म की शर्त नहीं लगाई जाती। साथ ही, बद्रीनाथ-केदारनाथ जैसे तीर्थ पर्यटन और आजीविका से भी जुड़े हैं, जहां विभिन्न समुदायों के लोग काम करते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, मंदिरों का प्रशासन धार्मिक परंपराओं के अनुसार नियम बना सकता है, लेकिन सार्वजनिक रूप से संचालित और सरकारी सहयोग से चलने वाले धार्मिक स्थलों में प्रवेश प्रतिबंध संवैधानिक जांच के दायरे में आ सकता है। इससे पहले भी देश के अन्य मंदिरों में ऐसे मुद्दे अदालतों तक पहुंच चुके हैं।
फिलहाल इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन बहस साफ दिखाती है कि यह सिर्फ मंदिरों के प्रवेश का सवाल नहीं है। यह सवाल है—आस्था की रक्षा कैसे हो, बिना सामाजिक समरसता और संवैधानिक मूल्यों को ठेस पहुंचाए। बद्रीनाथ-केदारनाथ का यह विवाद आने वाले समय में धार्मिक और राजनीतिक विमर्श को और तेज़ कर सकता है।