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तिरंगे का नागरिकों के हाथों और दिलों तक का सफर: लोकतंत्र की एक कहानी

National  •  👁 11 views  •  24 Jan 2026
तिरंगे का नागरिकों के हाथों और दिलों तक का सफर: लोकतंत्र की एक कहानी
भारत का तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, एकता और लोकतंत्र का प्रतीक है। स्वतंत्रता संग्राम के बाद से लेकर आज तक, तिरंगे का सफर नागरिकों के हाथों और दिलों तक पहुंचने की एक प्रेरक कहानी कहता है।
तिरंगा पहली बार 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया और उसके बाद यह राष्ट्र की शान और सम्मान का प्रतीक बन गया। हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगे को फहराने की परंपरा न केवल देशभक्ति को जागृत करती है, बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता का भी प्रतीक है। नागरिक अपने घरों, स्कूलों और कार्यालयों में तिरंगा फहराकर देशभक्ति की भावना को जीवित रखते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, तिरंगा का महत्व केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। यह समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे मूल्यों का संदेश भी देता है। नागरिकों के हाथों में तिरंगा यह दिखाता है कि लोकतंत्र में शक्ति जनता के पास है, और यह शक्ति जिम्मेदारी और गर्व के साथ प्रयोग की जानी चाहिए।
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में तिरंगे की सजावट, स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रीय गीत, और सरकारी कार्यक्रमों में तिरंगे के सम्मान ने इसे सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना दिया है। यह बच्चों और युवाओं को देशभक्ति और नागरिक जिम्मेदारी के मूल्यों से जोड़ता है।
कुल मिलाकर, तिरंगे का सफर केवल कागज़ और कपड़े तक सीमित नहीं है। यह हाथों में लेकर गर्व करने और दिलों में सम्मान की भावना जगाने वाला प्रतीक है। भारत के लोकतंत्र की कहानी इसी तिरंगे में झलकती है, जो हर नागरिक के जीवन और हृदय का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।