The Current Scenario
--:--:-- | Loading...
🔴 हिलसा में महाशिवरात्रि को लेकर ब्रह्माकुमारी बहनों की भव्य चैतन्य शोभायात्रा, नगर हुआ भक्तिमय     🔴 खौफनाक वारदात: पत्नी की हत्या कर खेत में दफनाया शव, ऊपर बो दी गेहूं की फसल; दो महीने बाद खुला राज     🔴 पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे पहुँचे स्वामी विवेकानंद अवार्ड सेरेमनी में     🔴 बाँका में DM और SP ने किया EVM/VVPAT वेयर हाउस का औचक निरीक्षण, सुरक्षा व्यवस्था की हुई गहन समीक्षा     🔴 लखीसराय पुलिस ने जारी किया पोस्टर, 14 वर्षीय किशोरी नेहा कुमारी लापता     🔴 मद्य निषेध के तहत बड़ी कार्रवाई, 69 लीटर अवैध शराब बरामद     🔴 दरभंगा में 6 साल की मासूम से दरिंदगी, इलाके में आक्रोश—आरोपी को कड़ी सजा की मांग     🔴 एकरससराय स्थित प्रसिद्ध आंगारी धाम की धर्मशाला जर्जर, हादसे का खतरा बढ़ा     🔴 अहमदाबाद के सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट स्कूल में लगातार घटनाएँ, अभिभावकों में गहरी चिंता     🔴 खुदागंज थाना पहुंचा भटकता मिला 8 वर्षीय बालक, स्थानीय लोगों की मदद से पुलिस कर रही पहचान की कोशिश    
accident Airlines Animals Business Crime Economy Education Entertainment Environment Festival Health Inspection International law Local National Nature Politics Research social Social media Sports Technology walfare Weather

बिना मांग के ली गई रकम भी रिश्वत: केरल हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारी की सज़ा बरकरार रखी

Crime  •  👁 11 views  •  08 Jan 2026
बिना मांग के ली गई रकम भी रिश्वत: केरल हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारी की सज़ा बरकरार रखी
केरल हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई सरकारी अधिकारी बिना स्पष्ट मांग के भी अवैध रकम स्वीकार करता है, तो वह भी रिश्वत की श्रेणी में आता है। अदालत ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए एक सरकारी अधिकारी की सज़ा को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि रिश्वत के मामलों में “मांग” ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती।
अदालत के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण कानून का उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं में ईमानदारी बनाए रखना है। यदि कोई अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करते हुए किसी लाभार्थी से पैसे स्वीकार करता है, भले ही उसने पहले से मांग न की हो, तब भी यह कानून के तहत अपराध माना जाएगा। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य, अधिकारी का आचरण और रकम स्वीकार करने की मंशा बेहद महत्वपूर्ण होती है।
यह मामला एक सरकारी अधिकारी से जुड़ा था, जिस पर अपने आधिकारिक कर्तव्यों के बदले अवैध राशि स्वीकार करने का आरोप था। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई थी, जिसे चुनौती देते हुए मामला हाई कोर्ट पहुंचा। हालांकि, हाई कोर्ट ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और सज़ा में कोई हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि “बिना मांग के रिश्वत” को अपराध न माना जाए, तो इससे भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का रास्ता मिल जाएगा। ऐसे में कानून का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से ईमानदारी और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
इस फैसले को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में रिश्वत से जुड़े मामलों में एक अहम नज़ीर बनेगा। साथ ही, यह सरकारी कर्मचारियों को चेतावनी देता है कि किसी भी रूप में अवैध लाभ स्वीकार करना कानूनन गंभीर अपराध है, चाहे उसकी मांग की गई हो या नहीं।