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क्या 1,000 दिन की देरी न्याय को रोक सकती है? मद्रास हाई कोर्ट ने आर्टिकल 21 के तहत दोषी की अपील सुनने का दिया आदेश

Crime  •  👁 11 views  •  03 Feb 2026
क्या 1,000 दिन की देरी न्याय को रोक सकती है? मद्रास हाई कोर्ट ने आर्टिकल 21 के तहत दोषी की अपील सुनने का दिया आदेश
मद्रास हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि केवल देरी के आधार पर किसी दोषी व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने लगभग 1,000 दिनों की देरी से दायर की गई आपराधिक अपील को सुनने की अनुमति देते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (आर्टिकल 21) का सहारा लिया, जो हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
यह मामला उस दोषी से जुड़ा था, जिसने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ अपील दायर करने में लगभग तीन साल की देरी की थी। अभियोजन पक्ष ने देरी को आधार बनाकर अपील खारिज करने की मांग की, जबकि आरोपी ने तर्क दिया कि परिस्थितियों और कानूनी सलाह की कमी के कारण वह समय पर अपील दाखिल नहीं कर सका।
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्याय केवल प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर लगी हो, तो तकनीकी आधारों पर उसकी अपील को खारिज करना अनुच्छेद 21 की भावना के खिलाफ होगा। न्यायालय के अनुसार, “न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय से इनकार नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी माना कि हर देरी जानबूझकर नहीं होती और कई बार सामाजिक, आर्थिक या कानूनी जानकारी के अभाव में आरोपी समय पर अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाते। ऐसे मामलों में अदालतों का दायित्व है कि वे न्याय के व्यापक सिद्धांतों को प्राथमिकता दें।
इस फैसले को आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय न केवल दोषियों के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि न्याय केवल समय-सीमा तक सीमित न रह जाए। मद्रास हाई कोर्ट का यह रुख यह संदेश देता है कि संविधान के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है, चाहे अपील में कितनी भी देरी क्यों न हुई हो।