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‘अर्धांगिनी’ पत्नी की पारंपरिक अवधारणा बदल गई है: पति की याचिका खारिज करने के फैसले को झारखंड हाई कोर्ट ने क्यों ठहराया सही

Crime  •  👁 7 views  •  31 Jan 2026
‘अर्धांगिनी’ पत्नी की पारंपरिक अवधारणा बदल गई है: पति की याचिका खारिज करने के फैसले को झारखंड हाई कोर्ट ने क्यों ठहराया सही
झारखंड हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि “अर्धांगिनी” के रूप में पत्नी की पारंपरिक अवधारणा अब बदल चुकी है। अदालत ने इसी आधार पर पति द्वारा दायर याचिका को खारिज करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि आज के समय में पत्नी को केवल पति पर निर्भर या उसके अधीन मानना उचित नहीं है।
मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें पति ने यह तर्क दिया था कि पत्नी उसके साथ रहने के लिए बाध्य है और पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं के अनुसार उसे पति का साथ देना चाहिए। पति ने निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा कि समाज में महिलाओं की भूमिका में व्यापक बदलाव आया है। महिलाएं अब शिक्षित, आत्मनिर्भर और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं। ऐसे में पत्नी को केवल “अर्धांगिनी” के पुराने नजरिए से देखना संविधान में दिए गए समानता और गरिमा के अधिकारों के खिलाफ है।
हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि विवाह का अर्थ यह नहीं होता कि महिला अपनी इच्छा, सम्मान और स्वतंत्रता को त्याग दे। यदि पति का व्यवहार या परिस्थितियां पत्नी के सम्मान और मानसिक शांति के विपरीत हों, तो उसे अलग रहने का अधिकार है।
अदालत ने निचली अदालत के उस निष्कर्ष से सहमति जताई जिसमें कहा गया था कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के उससे अलग रह रही है। इसलिए पति की याचिका को खारिज किया जाना पूरी तरह सही है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला न केवल वैवाहिक कानूनों की आधुनिक व्याख्या को दर्शाता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि विवाह समानता, सम्मान और आपसी समझ पर आधारित संबंध है, न कि परंपराओं के नाम पर किसी एक पक्ष के अधिकारों का हनन।