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‘रिश्ता मतलब शोषण का लाइसेंस नहीं’: झारखंड हाईकोर्ट ने महिला की निजी तस्वीरें लीक करने वाले व्यक्ति को अग्रिम जमानत न देने का आदेश

Crime  •  👁 14 views  •  27 Jan 2026
‘रिश्ता मतलब शोषण का लाइसेंस नहीं’: झारखंड हाईकोर्ट ने महिला की निजी तस्वीरें लीक करने वाले व्यक्ति को अग्रिम जमानत न देने का आदेश
झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) ने एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत (anticipatory bail) याचिका को खारिज कर दिया है, जो एक महिला की निजी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर लीक करने और उसे सोशल मीडिया पर फैलाने के आरोप में शामिल था। अदालत ने इस मामले में कहा कि रिश्ता होने का मतलब किसी के अधिकारों या प्रतिष्ठा का शोषण करने का लाइसेंस नहीं मिलता।
यह मामला उस व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था जिस पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत साइबर अपराध, ब्लैकमेलिंग, धमकी, मानहानि, उत्पीड़न और अश्लील सामग्री प्रसारित करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोप है कि उसने नकली ई‑मेल और फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर महिला की निजी तस्वीरें और आपत्तिजनक संदेश उसके कार्यस्थल के कर्मचारियों को भेजे।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने पारित आदेश में स्पष्ट किया कि शुरुआत में यह केवल “मित्रता” का मामला हो सकता है, लेकिन बाद में आरोपी ने रिश्ते की विश्वास और सीमाओं का दुरुपयोग किया। अदालत ने कहा कि दो लोगों के बीच संबंध होने का मतलब एक पक्ष को दूसरे की कमजोरियां या प्रतिष्ठा भुनाने का अधिकार नहीं देता।
पीछे अदालत ने यह भी माना कि आरोपी की दलील — कि महिला पहले से विवाहित थी और इसलिए मामला उनके खिलाफ गलत है — अमान्य और अस्वीकार्य है। अदालत ने कहा कि महिला ने आरोपी के साथ अपने वैवाहिक स्थिति के बारे में बता दिया था और दोनों के बीच कोई भी रिश्ता स्वयं की इच्छा से था, लेकिन फिर भी आरोपी का व्यवहार गंभीर अपराध के दायरे में आता है।
अदालत का यह कदम यह स्पष्ट करता है कि कानून और न्याय व्यवस्था महिलाओं की निजता, प्रतिष्ठा और सम्मान की रक्षा को प्राथमिकता देते हैं, और यह कि सामाजिक या व्यक्तिगत रिश्ते किसी भी तरह से व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन करने का औचित्य प्रदान नहीं करते।
ऐसे मामलों में न्यायपालिका की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी देती है कि प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया का दुरुपयोग महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को बढ़ा सकता है, और ऐसे आरोपों पर कड़ी कार्रवाई ज़रूरी है।
इस फैसले से यह भी संकेत मिलता है कि अदालतें केवल तकनीकी या कानूनी पहलुओं पर नहीं, बल्कि मानवाधिकार, सम्मान और निजता जैसे मूल्यों का भी ध्यान रखती हैं।