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दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्देश: कामकाजी माताओं को पिता की जिम्मेदारी से बचने के कारण खुद को थकाने पर न मजबूर करें

Crime  •  👁 50 views  •  29 Dec 2025
दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्देश: कामकाजी माताओं को पिता की जिम्मेदारी से बचने के कारण खुद को थकाने पर न मजबूर करें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में कामकाजी माताओं और बाल भरण-पोषण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि बच्चों की परवरिश और पालन-पोषण केवल माताओं की जिम्मेदारी नहीं है। पिता द्वारा जिम्मेदारी से बचने के कारण माताओं को अपने स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की कीमत पर कामकाज और बच्चों की देखभाल दोनों करना नहीं चाहिए।
न्यायालय ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में की, जहां बाल भरण-पोषण और माता-पिता की जिम्मेदारियों का विवाद उठाया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता को अपने बच्चों की परवरिश में बराबर की भूमिका निभानी होगी। केवल माता पर जिम्मेदारी डालकर उसे थकाने और मानसिक दबाव में डालना उचित नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय कामकाजी माताओं के अधिकारों और बाल कल्याण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। कामकाजी माताओं को अक्सर पेशेवर और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। यदि पिता समान रूप से योगदान दें, तो न केवल माताओं की थकान कम होगी, बल्कि बच्चों का पालन-पोषण भी बेहतर ढंग से होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि पिता द्वारा वित्तीय और भावनात्मक जिम्मेदारी निभाना न केवल कानूनी कर्तव्य है, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है। इस दिशा में अदालत का रुख परिवारों और समाज को जागरूक करने के लिए संदेश देता है कि बच्चों की परवरिश केवल माताओं की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।
इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायपालिका बाल कल्याण और लैंगिक समानता को महत्व देती है। कामकाजी माताओं को अपनी जिम्मेदारियों और करियर में संतुलन बनाए रखने के लिए पिता और परिवार का समर्थन अनिवार्य है। अदालत की यह टिप्पणी आने वाले समय में परिवारों में जिम्मेदारी की बराबरी सुनिश्चित करने में मददगार साबित हो सकती है।