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हिमंत बिस्वा सरमा और सत्ता की मर्यादा: प्रेमचंद की यह कहानी आज क्यों ज़रूरी है

Politics  •  👁 14 views  •  30 Jan 2026
हिमंत बिस्वा सरमा और सत्ता की मर्यादा: प्रेमचंद की यह कहानी आज क्यों ज़रूरी है
नई दिल्ली: सार्वजनिक जीवन में बैठे नेताओं से केवल प्रशासनिक दक्षता ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, भाषा की गरिमा और नैतिक जिम्मेदारी की भी अपेक्षा की जाती है। हाल के दिनों में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कुछ बयानों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या सत्ता में बैठे लोग अपनी पद की मर्यादा को भूलते जा रहे हैं। ऐसे समय में, हिंदी साहित्य के महान लेखक मुंशी प्रेमचंद की एक छोटी लेकिन गहरी कहानी आज असाधारण रूप से प्रासंगिक लगती है।
प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (या वैचारिक रूप से ‘पंच परमेश्वर’ जैसी रचनाएं) सत्ता, अहंकार और जिम्मेदारी के बीच के टकराव को बेहद सहज लेकिन तीखे ढंग से सामने रखती है। प्रेमचंद यह दिखाते हैं कि जब व्यक्ति नैतिक विवेक छोड़कर सत्ता, पहचान या निजी पूर्वाग्रह से निर्णय लेने लगता है, तो वह न सिर्फ दूसरों के साथ अन्याय करता है, बल्कि अपने पद और भूमिका को भी खोखला कर देता है।
आज की राजनीति में भी यही खतरा दिखता है। जब बयान समाज को जोड़ने की बजाय बांटने, या संवाद की जगह उकसावे का काम करने लगें, तो वह सत्ता की ताकत नहीं, उसकी कमजोरी को उजागर करते हैं। प्रेमचंद की कहानियां याद दिलाती हैं कि सच्ची ताकत संयम, करुणा और न्याय में होती है—न कि शब्दों की तीक्ष्णता या बहुसंख्यक समर्थन के शोर में।
यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं, बल्कि एक साहित्यिक आईना है। प्रेमचंद की रचनाएं बताती हैं कि नेतृत्व का असली मूल्य लोकप्रियता नहीं, लोक-कल्याण है। अगर आज के नेता उन्हें पढ़ें, तो शायद यह समझ आए कि पद की गरिमा शब्दों से नहीं, आचरण से बचती है।
संक्षेप में, सत्ता में बैठे लोगों के लिए प्रेमचंद सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि नैतिक मार्गदर्शक हैं—और आज उनकी कहानियों को पढ़ना पहले से कहीं ज़्यादा जरूरी है।