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‘भारतीय उद्योग EU कार्बन टैक्स मानदंडों के अनुरूप बने के लिए अलग‑अलग रास्ते तलाश रहा है’: नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव

International  •  👁 12 views  •  27 Jan 2026
‘भारतीय उद्योग EU कार्बन टैक्स मानदंडों के अनुरूप बने के लिए अलग‑अलग रास्ते तलाश रहा है’: नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव
केंद्रीय नए एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव सन्तोष कुमार सरंगी ने कहा है कि भारतीय उद्योग अब यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन टैक्स नियमों — खासकर कार्बन बॉर्डर एड्जस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) — के अनुरूप बनने के लिए कई अलग‑अलग रणनीतिक और तकनीकी रास्तों पर काम कर रहा है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत‑EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की चर्चा और कार्बन टैक्स लागू होने की प्रक्रिया दोनों एक‑साथ चल रहे हैं।
EU का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) 2026 से प्रभावी हुआ है, जिसका मकसद उन आयातित मालों पर कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाना है जो यूरोपीय बाजार में प्रवेश करते हैं, ताकि ग्लोबल उत्सर्जन कम किया जा सके और कार्बन ‘लीकेज’ (उच्च‑कार्बन उत्पादन को कम‑कठोर देशों में स्थानांतरित करना) को रोका जा सके। इससे भारतीय उत्पाद जैसे इस्पात, सीमेंट, ऐल्युमीनियम और उर्वरक जैसे कार्बन‑गहन वस्तुओं के निर्यात पर अतिरिक्त लागत लग सकती है यदि उद्योग कम‑कार्बन उत्पादन की स्थिति साबित नहीं कर पाते।
सरंगी ने कहा है कि भारतीय उद्योग न केवल नियमों को समझने और अनुपालन प्रणाली तैयार करने के तरीकों पर काम कर रहे हैं, बल्कि स्वच्छ उत्पादन तकनीकों, ऊर्जा दक्षता, उत्सर्जन डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग जैसी प्रक्रियाओं को भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि EU‑बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बने रहें। एफटीए वार्ताओं में भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि EU के तकनीकी तंत्र के साथ तालमेल बैठाने के लिए साझेदारी और संवाद स्थापित किया जाए, जिससे भारतीय कंपनियों को भी CBAM के तहत आवश्यक मानकों को पूरा करने में सहायता मिले।
नवीनतम नीति प्रयासों में नीति आयोग जैसे संस्थानों द्वारा भारी‑उत्सर्जन वाले क्षेत्रों के लिए डीकार्बनाइजेशन रोडमैप तैयार करना भी शामिल है — विशेष रूप से सीमेंट और ऐल्युमीनियम उद्योगों के लिए — ताकि परंपरागत, कोयला‑आधारित प्रक्रियाओं से साक्ष्य‑आधारित कम‑कार्बन मार्गों की ओर संक्रमण को गति दी जा सके। यह कदम भारत की 2070 तक नेट‑जीरो लक्ष्य के अनुरूप भी है और वैश्विक पर्यावरण लक्ष्यों के साथ रणनीतिक रूप से जुड़ता है।
विश्लेषकों के अनुसार, इन तैयारियों से भारतीय उद्योग भविष्य के व्यापार और जलवायु नियमों के अनुरूप जल्दी अनुकूलित हो सकते हैं, जिससे निर्यात क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मकता दोनों को संतुलित किया जा सके — खासकर जब EU जैसे बड़े बाजार में निर्माण और टिकाऊकरण रणनीतियाँ लगातार सख्त होती जा रही हैं।