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‘ट्रंप के “पीस बोर्ड” को भारत को नहीं कहना चाहिए’; ‘EC को SIR प्रक्रिया को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना चाहिए’ — उर्दू प्रेस की प्रमुख राय

International  •  👁 10 views  •  27 Jan 2026
‘ट्रंप के “पीस बोर्ड” को भारत को नहीं कहना चाहिए’; ‘EC को SIR प्रक्रिया को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना चाहिए’ — उर्दू प्रेस की प्रमुख राय
उर्दू भाषी मीडिया ने हाल के दिनों में दो बड़े मुद्दों पर अपनी राय दी है — एक अंतरराष्ट्रीय और दूसरा घरेलू लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा। पहला डोनाल्ड ट्रंप के “Board of Peace” को लेकर है, और दूसरा चुनावी rolls के विशेष सुधार कार्यक्रम (Special Intensive Revision — SIR) को लेकर चुनाव आयोग (EC) की कार्यप्रणाली पर चिंता।
सबसे पहले हैदराबाद से प्रकाशित ‘मुनसीफ़’ अख़बार ने ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘पीस बोर्ड’ पर चुनावी टिप्पणी दी कि भारत को इसमें शामिल होने से पहले दो बार सोचना चाहिए। ट्रंप ने इस बोर्ड का गठन गाज़ा क्षेत्र में स्थायी शांति लाने के उद्देश्य से किया है और कई देशों के नेताओं को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी है। लेकिन अख़बार के अनुसार यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र जैसी स्थापित बहुपक्षीय संस्थाओं के विकल्प के रूप में इज़राइल‑हमास संघर्ष के समाधान से आगे वैश्विक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, और यह ट्रंप के “व्यवसाय‑दृष्टिकोण” को दर्शाता है। इसलिए भारत को अपनी रूढ़ नीति — बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता — को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव पर पहले विचार करना चाहिए, अन्यथा इससे भारत की दीर्घकालिक विदेशनीति प्रभावित हो सकती है।
दूसरे विषय में उर्दू अख़बार ‘सियासत’ ने चुनाव आयोग द्वारा नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में चल रहे SIR प्रक्रिया को लेकर आलोचना की है। SIR का मकसद मतदाता सूची से मृत या अयोग्य नाम हटाकर सूची को सुधारा जाना है, लेकिन कई हिस्सों में पारदर्शिता और त्रुटिरहित संचालन की कमी पर सवाल उठे हैं। उदाहरण के तौर पर बिहार में संशोधित ड्राफ्ट रोल में बहुत से जीवित मतदाताओं के नाम भी मिटा दिए गए, जिससे मतदान के मौलिक अधिकार पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। अख़बार ने कहा कि ऐसे संवेदनशील काम में घाटे या भटके हुए नामों को हटाना जरूरी है, पर इसे “पूरी पारदर्शिता और त्रुटि‑रहित ढंग” से लागू करना चाहिए ताकि कोई भी वैध मतदाता खोया न जाए और लोकतंत्र सुरक्षित रहे।
इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि उर्दू प्रेस आज दोनों वैश्विक राजनीति और घरेलू लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को गंभीरता से देख रहा है — जहाँ एक तरफ भारत के विदेशी मंचों में कदम रखने से जुड़ी रणनीति पर सलाह दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू चुनावी प्रणाली में भरोसे और पारदर्शिता को मज़बूत करने पर जोर दिया जा रहा है।