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‘रंग दे बसंती’ के 20 साल: सत्ता से सवाल करने वाले गीतों से सत्ता के गलियारों तक, प्रसून जोशी का सफर

Entertainment   •   👁 23 views   •   27 Jan 2026
‘रंग दे बसंती’ के 20 साल: सत्ता से सवाल करने वाले गीतों से सत्ता के गलियारों तक, प्रसून जोशी का सफर
हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिनी जाने वाली रंग दे बसंती को रिलीज़ हुए अब 20 साल पूरे हो चुके हैं। 2006 में आई इस फिल्म ने सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल नहीं की, बल्कि युवाओं की सोच, राजनीति और विरोध के मायने भी बदल दिए। फिल्म के गीतों और संवादों ने सत्ता से सवाल करने की एक पूरी पीढ़ी को आवाज़ दी। इन गीतों के पीछे थे कवि और गीतकार प्रसून जोशी।
‘लुका छुपी’, ‘रूबरू’, ‘पाठशाला’ और टाइटल ट्रैक ‘रंग दे बसंती’ जैसे गाने सिर्फ फिल्मी गीत नहीं थे, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ एक भावनात्मक घोषणापत्र थे। ये गीत भ्रष्टाचार, राजनीतिक उदासीनता और नागरिक जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर सीधा प्रहार करते थे। उस दौर में प्रसून जोशी की पहचान एक ऐसे रचनाकार की थी, जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखता था।
लेकिन 20 साल बाद तस्वीर बदली हुई नजर आती है। आज वही प्रसून जोशी सरकारी संस्थानों और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े अहम पदों पर रहे हैं। वह सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के चेयरमैन रह चुके हैं और सरकारी अभियानों व ब्रांडिंग का भी हिस्सा रहे हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया और बौद्धिक हलकों में यह सवाल बार-बार उठता है—क्या सत्ता के खिलाफ लिखने वाला कवि अब खुद सत्ता का हिस्सा बन चुका है?
कुछ लोग इसे वैचारिक बदलाव मानते हैं, तो कुछ इसे व्यवस्था के भीतर रहकर बदलाव लाने की कोशिश बताते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि सत्ता के करीब जाने से रचनात्मक स्वतंत्रता और विरोध की धार कुंद हो जाती है।
रंग दे बसंती आज भी युवाओं को प्रेरित करती है, लेकिन उसके रचनाकार के सफर ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि क्या सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोग समय के साथ उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं। 20 साल बाद यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई याद नहीं, बल्कि विचारधारा और सत्ता के रिश्ते पर एक जिंदा सवाल बन चुकी है।