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डिकोड पॉलिटिक्स: 2019 के बाद J&K की बहस में 1950 का 'डिक्सन प्लान' क्यों सामने आया है?

Politics  •  👁 11 views  •  22 Jan 2026
डिकोड पॉलिटिक्स: 2019 के बाद J&K की बहस में 1950 का 'डिक्सन प्लान' क्यों सामने आया है?
2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर मुद्दे पर देश-विदेश में बहस तेज हुई और इसी क्रम में 1950 का ‘डिक्सन प्लान’ एक बार फिर चर्चा में आ गया। यह योजना संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि और ऑस्ट्रेलियाई न्यायाधीश सर ओवेन डिक्सन ने भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद के समाधान के लिए प्रस्तावित की थी। डिक्सन प्लान का मूल तर्क यह था कि पूरे जम्मू-कश्मीर में एक साथ जनमत संग्रह कराना व्यावहारिक नहीं है, इसलिए क्षेत्रीय आधार पर समाधान खोजा जाए। इसके तहत जम्मू और लद्दाख को भारत के साथ, पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों को पाकिस्तान के साथ और केवल कश्मीर घाटी में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई थी। हालांकि उस समय यह योजना इसलिए लागू नहीं हो सकी क्योंकि भारत पूरे राज्य में जनमत संग्रह पर जोर दे रहा था, जबकि पाकिस्तान सीमित क्षेत्रीय विकल्प चाहता था। 2019 के बाद इस पुराने प्रस्ताव का दोबारा उल्लेख इसलिए होने लगा क्योंकि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति, प्रशासनिक ढांचा और राजनीतिक पहचान में बड़ा बदलाव आया। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और कुछ थिंक-टैंकों ने तर्क देना शुरू किया कि कश्मीर अब केवल भारत-पाक का द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की ऐतिहासिक, राजनीतिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं से जुड़ा मामला बन गया है, जो डिक्सन प्लान की सोच से मेल खाता दिखता है। पाकिस्तान समर्थक विमर्श में भी इस योजना को यह दिखाने के लिए उठाया जा रहा है कि कश्मीर के लिए अतीत में वैकल्पिक समाधान मौजूद थे। वहीं भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर उसका आंतरिक विषय है और डिक्सन प्लान जैसे पुराने प्रस्ताव आज के संदर्भ में पूरी तरह अप्रासंगिक हैं। डिकोड पॉलिटिक्स के नजरिए से देखा जाए तो डिक्सन प्लान का फिर से सामने आना इस बात का संकेत है कि 2019 के बाद कश्मीर पर चल रही बहसें इतिहास के अधूरे और असफल समाधानों को संदर्भ बनाकर मौजूदा राजनीतिक बदलावों को समझने और परिभाषित करने की कोशिश कर रही हैं।