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BJP के बंगाल के 'शांतिदूत' कौन हैं? जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, पार्टी ने और लोगों को बुलाया है।

Politics  •  👁 13 views  •  20 Jan 2026
BJP के बंगाल के 'शांतिदूत' कौन हैं? जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, पार्टी ने और लोगों को बुलाया है।
जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राज्य में अपनी रणनीति को और धार देना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में पार्टी ने कुछ वरिष्ठ नेताओं को “शांतिदूत” की भूमिका में आगे किया है, जिनका मकसद संगठन के भीतर चल रही खींचतान को कम करना, गुटबाज़ी को साधना और असंतुष्ट नेताओं को फिर से साथ लाना है।
पिछले कुछ वर्षों में बंगाल बीजेपी में नेतृत्व को लेकर मतभेद, चुनावी हार के बाद निराशा और टीएमसी से आए नेताओं व पुराने कैडर के बीच तनाव खुलकर सामने आया है। केंद्रीय नेतृत्व को एहसास है कि यदि इन अंदरूनी विवादों को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो चुनावी मैदान में पार्टी कमजोर पड़ सकती है। इसी वजह से ‘शांतिदूतों’ की तैनाती की गई है।
ये शांतिदूत आम तौर पर ऐसे नेता हैं जिनकी संगठन में पकड़ मजबूत है, जो केंद्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद माने जाते हैं और जिनका राजनीतिक अनुभव लंबा रहा है। वे राज्य इकाई के नेताओं, सांसदों, विधायकों और ज़मीनी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर रहे हैं, उनकी शिकायतें सुन रहे हैं और समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, टिकट वितरण और नेतृत्व संरचना को लेकर भी फीडबैक दिल्ली तक पहुंचाया जा रहा है।
बीजेपी की यह पहल केवल अंदरूनी शांति तक सीमित नहीं है। पार्टी नए चेहरों को जोड़ने, सहयोगी सामाजिक समूहों से संवाद बढ़ाने और टीएमसी से नाराज़ वर्गों को आकर्षित करने की भी कोशिश कर रही है। शांतिदूतों का एक अहम काम यह भी है कि पार्टी का संदेश एकसुर में जनता तक पहुंचे और आंतरिक मतभेद सार्वजनिक मंचों पर न दिखें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल जैसे जटिल राज्य में संगठनात्मक एकता चुनावी सफलता की कुंजी है। शांतिदूतों की यह भूमिका बीजेपी के लिए एक तरह का डैमेज कंट्रोल भी है और भविष्य की तैयारी भी। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह रणनीति पार्टी को कितनी मजबूती देती है और क्या बीजेपी बंगाल में अपने खोए हुए जनाधार को फिर से हासिल कर पाती है