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जैसे ही नितिन नवीन ने पद संभाला, आइए देखते हैं कि बीजेपी अपने अध्यक्ष को कैसे नियुक्त करती है: सर्वसम्मत चुनाव, कोई चुनाव नहीं।

Politics  •  👁 5 views  •  20 Jan 2026
जैसे ही नितिन नवीन ने पद संभाला, आइए देखते हैं कि बीजेपी अपने अध्यक्ष को कैसे नियुक्त करती है: सर्वसम्मत चुनाव, कोई चुनाव नहीं।
जैसे ही नितिन नवीन ने पद संभाला, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर अध्यक्ष चयन की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में आ गई है। यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से “चुनाव” कही जाती है, लेकिन व्यवहार में यह अक्सर सर्वसम्मति से तय नाम की घोषणा भर होती है। सवाल यह नहीं है कि नितिन नवीन योग्य हैं या नहीं, बल्कि यह है कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी अपने शीर्ष पद के लिए लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से क्यों बचती दिखती है।
बीजेपी का तर्क स्पष्ट है। पार्टी मानती है कि आंतरिक लोकतंत्र का अर्थ केवल मतपत्र नहीं होता, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, विचारधारा में एकरूपता और नेतृत्व पर सामूहिक विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी सोच के तहत “सर्वसम्मत चुनाव” को पार्टी स्थिरता और एकजुटता का प्रतीक मानती है। नेतृत्व का दावा रहता है कि जब संगठन के सभी प्रमुख घटक एक नाम पर सहमत हों, तो चुनाव की औपचारिकता अनावश्यक हो जाती है।
लेकिन आलोचकों की नजर में यही प्रक्रिया समस्या की जड़ है। उनका कहना है कि जब विकल्प सामने ही नहीं रखे जाते, तो असहमति की संभावना भी खत्म हो जाती है। यह तरीका पार्टी कैडर को निर्णय प्रक्रिया से दूर रखता है और शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव को और मजबूत करता है। लोकतंत्र केवल परिणाम नहीं, बल्कि प्रक्रिया भी होता है—और जब प्रक्रिया सीमित हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
नितिन नवीन का अध्यक्ष बनना इस परंपरा का ही विस्तार है। उनका चयन संगठनात्मक संतुलन, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यह नियुक्ति यह भी संकेत देती है कि बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन टकराव के बजाय नियंत्रण और निरंतरता के रास्ते से होता है।
अंततः यह बहस बीजेपी तक सीमित नहीं है। यह सवाल सभी दलों के लिए प्रासंगिक है कि आंतरिक लोकतंत्र की परिभाषा क्या होनी चाहिए। सर्वसम्मति से नेतृत्व चुनना एक रणनीति हो सकती है, लेकिन क्या यह लोकतांत्रिक आदर्शों को मजबूत करता है या उन्हें धीरे-धीरे खोखला करता है—यह प्रश्न अभी खुला है