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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

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आज कहां हैं नोबल पुरस्कार जीतने वाले?... क्या कोरोना पश्चिम को उसकी वास्तविक हैसियत से अवगत कराने के लिए आया है?

Sajjad Ali Nayane
14 April 2020
हम यहां नोबल पुरस्कार के लिए उचित कैंडीडेट चुनने की प्रक्रिया और मापदंडों पर सवाल नहीं उठाना चाहते बल्कि इस पुरस्कार पर एक अलग पहलू से नज़र डालना चाहते हैं जो कोरोना वायरस ने गंभीर संकट उत्पन्न करके हमारे सामने ला दिया है।
*www.thecurrentscenario.com*
नोबल पुरस्कार पर यदि देखा जाए तो पश्चिम का क़ब्ज़ा रहा है। पांच पश्चिमी देशों ने तो बार बार यह पुरस्कार अपने नाम करके यह संदेश देने की कोशिश की कि उन्होंने मानवता को बहुत बड़ा योगदान दिया है। इनमें सबसे पहला नाम अमरीका का है। उसके बाद ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस और स्वेडन का नाम आता है।
2016 के आंकड़ों से पता चला कि अमरीका को अब तक मेडिकल साइंस में 94, फ़िज़िक्स में 8 और केमिस्ट्री में 69 नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं। ब्रिटेन को मेडिकल साइंस में 29 फ़िज़िक्स में 25 और केमिस्ट्री में 29 नोबल पुरस्कार, फ़्रांस को मेडिकल साइंस में 11 फ़ज़िक्स में 13 और केमिस्ट्री में 8 नोबल पुरस्कार, जर्मनी को मेडिकल साइंस में 17, फ़िज़िक्स में 24 और केमेस्ट्री में 32 नोबल पुरस्कार, स्वेडन को मेडिकल साइंस में 8 फ़िज़िक्स में 4 और केमेस्ट्री में 5 नोबल पुरस्कार, रूस को मेडिकल साइंस में 2, फ़िज़िक्स में 11 और केमिस्ट्री में 1 नोबल पुरस्कार, जापान को मेडिकल साइंस में 3 फ़िज़िक्स में 11 और केमिस्ट्री में 7, स्विज़रलैंड को मेडिकल साइंस में 7 फ़िज़िक्स में 5 और केमिस्ट्री में 6, कैनेडा को मेडिकल साइंस में 4 फ़िज़िक्स में 4 केमिस्ट्री में 5 नोबल पुरस्कार और इटली को मेडिकल साइंस में 5 फ़िज़िक्स में 5 और केमिस्ट्री में एक नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं।
यहां आलोचक यह शक ज़ाहिर करते हैं कि कुछ ख़ास कारणों से एक शताब्दी के दौरान विज्ञान और मेडिकल साइंस के क्षेत्र में नोबल पुरस्कारों पर पश्चिम का ही अधिकार क्यों रहा है। इस समय जब कोरोना वायरस की महामारी पूरी दुनिया में फैली है तो यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या बात है कि उन देशों में भी कोरोना का दंश बहुत ज़्यादा है जिन्हें यह पुरस्कार सबसे अधिक मिले हैं।
क्या कारण है कि  मेडिकल साइंस में सबसे अधिक नोबल पुरस्कार जीतने वाले देश में कोरोना का संकट सबसे ज़्यादा गंभीर है और सबसे ज़्यादा मौतें वहां हो रही हैं? अमरीका, ब्रिटेन, इटली, फ़्रांस और जर्मनी की कोराना के सामने बेबसी यह साबित नहीं करती कि पश्चिमी देशों ने विज्ञान के क्षेत्र में विकास की जो कल्पना तैयार कर रखी थी वह धोखे से ज़्यादा कुछ नहीं थी? क्या कोरोना पश्चिम को उसकी वास्तविक हैसियत से अवगत कराने के लिए आया है?