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Sunday, June 21, 2020

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विश्व योग दिवस पर योग की महत्ता

योग कर्मसु कौशलं

सजंय सिंह
हरिहरपुर (सुल्तानपुर) 21 June  2020
संस्कृत व्याकरणशास्त्र के अनुसार "युज समाधौ"सूत्र से आत्मनेपदी दिवादिगण में 'घ्यं'प्रत्यय लगाने से योग शब्द की निष्पत्ति होती है।जिसका सामान्य अर्थ समाधि या जुड़ना होता है।किंतु "योगः चित्त वृत्ति निरोध: परिभाषा से यहां जुड़ने की अपेक्षाकृत समाधि अर्थ अधिक उपयुक्त औरकि प्रासंगिक लगता है।
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन सनातन जीवन मूल्यों और जीवनशैलियों में सर्वश्रेष्ठ हिन्दू धर्म के पौराणिक ग्रन्थों और मान्यताओं के अनुसार महेश्वर भगवान श्रीशंकर को आदियोगी कहा जाता है।रामचरित मानस में भी इसी तथ्य का वर्णन करते हुए सती प्रसंग का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी लिखे हैं-
"शंकर सहज स्वरूप सँवारा।
लागि समाधि अखंड अपारा।।
इसप्रकार कहा जा सकता है कि मन,आत्मा और शरीर को एकाकार करते हुए अपने को परमतत्व से तादात्म्य स्थापित करने की क्रिया जहां समाधि है वहीं अप्राप्ति(परमतत्व)की प्राप्ति ही योग होता है।गणितशास्त्र में भी दो या दो से अधिक अंकों-वस्तुओं का आपस मे जुड़कर एक(एकाकार)होने की प्रक्रिया योग(add) कहलाती है।अप्राप्ति की प्राप्ति का तरीका ही आधुनिक मनोविज्ञान में skill अर्थात कौशल या हुनर कहलाता है।इसप्रकार योग वह पद्धति है जिसके द्वारा कठिन से कठिन लक्ष्यों को कौशल के द्वारा हासिल किया जा सकता है।इसप्रकार योग को योग कर्मसु कौशलं कहकर परिभाषित करना बिल्कुल सटीक व यथार्थ लगता है।
योग का तातपर्य केवल व्यायाम मात्र नहीं है अपितु यम,नियम,प्राणायाम आदि आठप्रकार की क्रियाएं हैं।जिनमें प्राणायाम अर्थात व्यायाम सर्वसामान्य के लिये अत्यंत सरल व सहज मार्ग है जिसके द्वारा कोई भी स्वयम को स्वस्थ,निरोग और नियमित रखते हुए अपनी दैनिक क्रियाओं का सम्पादन प्रसन्नतापूर्वक कर सकता है।
प्राणायाम शब्द प्राण शब्द में अयाम शब्द के जुड़ने से बनता है।प्राण शब्द जा शाब्दिक अर्थ जहां वायु होता है वहीं अयाम का अर्थ नियंत्रण होता है।इसप्रकार प्राणायाम में शरीर की प्राणवायु के नियंत्रण से उदान और अपानवायु को भी नियंत्रण करना होता है।चिकित्सा मनोविज्ञान भी प्राणायाम के इस आशातीत लाभ के महत्त्व को स्वीकार करता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 14 दिसंबर 2014 को प्रतिवर्ष 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता देना कदाचित भारत की उस प्राचीन परंपरा और साधनाशैली को स्वीकार करने जैसा है जिसका अनुशीलन 1893 में शिकागो में स्वामी विवेकानंद द्वारा विश्व धर्म सभा में पूरे विश्व को करने का उपदेश दिया गया था।यह भारतीय जीवनमूल्यों को मान्यता देने जैसा भी है।जिसे बौद्ध,जैन,सिख और अब सारे धर्म मतावलम्बी भी स्वीकार करते हैं।
हरिहरपुर परिवार आज विश्व योग दिवस पर अखण्ड ब्रह्मांड में  वास अधिवास निवास कर रहे सभी अंडज, पिंडज, भूचर,खेचर, जलचर सहित सभी महाप्राण आत्माओं सहित जनमानस को सर्वे सन्तु निरामया की कामना के साथ कोटि कोटि शुभकामनाएं ज्ञापित करता है।

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