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Sunday, May 10, 2020

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ग्वालियर स्थित श्याम वाटिका के क्वारन्टीन सेंटर से शायद प्रशासन को सत्यता से अवगत कराया जा सके ।

संदीप शुक्ला
ग्वालियर,11 May 2020
एक ओर कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए सरकार और प्रशासन द्वारा बड़े पैमाने पर अपने प्रयासों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं जमीनी हकीकत इससे कहीं अलग डराने व व्यथित करने वाली है। हमारी टीम ने सरकारी कोशिशों की जमीनी हकीकत जानने के लिए आज रविवार को ग्वालियर की श्याम वाटिका में कोरोना संदिग्धों व बाहर से आने वाले मजदूरों के लिए बनाए गए क्वारन्टीन सेंटर का मौका मुआयना किया। हमारी टीम ने यहां के जो दयनीय व उपेक्षापूर्ण हालात देखे, उसने सरकार व प्रशासन के सारे दावों की पोल खोल कर रख दी है।
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  श्याम वाटिका में बीते रोज गोवा  से ग्वालियर आई श्रमिक स्पेशल ट्रेन से आए करीब 35 मजदूरों एवं उनके परिजनों को ठहराया गया है। इन गरीब मजदूरों पर चूल्हे से भाड़ में आने की कहावत चरितार्थ हो रही है। हमारी टीम ने देखा कि श्याम वाटिका के इस क्वारन्टीन सेंटर में चारों ओर जहां तहां गन्दगी, कचरे के ढेर, उपयोग किए हुए ग्लब्स, खाने के खाली डिब्बे एवं यहां पहले रह चुके मरीजों का उपयोग किया सामान पड़ा हुआ है। इन हालात में यहां संक्रमण फैलने से कोई नहीं रोक सकेगा। यहां ठहराए गए मजदूर यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें यहां बीमारी से बचाव के लिए रखा गया है या फिर बीमार करने। प्रशासन ने यहां सेनेटाइज्ड करने की जरूरत भी नहीं समझी।
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  हैरत की बात यह है कि इन मजदूरों व उनके परिजनों को यहां आए हुए 24 घण्टे से अधिक समय हो चुका है लेकिन अभी तक न तो इनका कोई जांच परीक्षण किया गया है और न ही कोई सेम्पल लेने की जरूरत समझी गई। जब कल दोपहर वे श्रमिक स्पेशल ट्रेन से ग्वालियर आए थे, तभी रेलवे स्टेशन पर नामचारे के लिए थर्मल स्क्रीनिंग की गई थी,  वह भी ऐसी खराब मशीन से जो 97 डिग्री टेम्प्रेचर को 104 डिग्री तक दिखा रही थी। मजदूरों ने हमारे संवाददाता को बताया कि श्याम वाटिका में न उनके खाने की व्यवस्था है और न सोने व दिनचर्या के दीगर काम निबटाने के लिए कोई मुकम्मल इंतजाम है। मजदूरों का कहना है कि वे गोवा से आए हैं जो पहले से ही कोरोना मुक्त है लिहाजा उन्हें क्वारन्टीन करने की कोई जरूरत ही नहीं थी, फिर भी उन्हें यहां क्वारन्टीन रहने में कोई एतराज नहीं है लेकिन क्वारन्टीन सेंटर में कम से कम साफसफाई, भोजन, विश्राम जैसी बुनियादी सुविधाएं तो सुलभ कराई जाएं। देखना है कि प्रशासन की नींद खुलती है या अभी भी नहीं।