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Tuesday, April 14, 2020

Indore

मध्यप्रदेश के मुस्लिम समाज की अज़ीम शख़्सियत मुफ़्ती-ए-मालवा मौलाना वलीउल्लाह साहब नहीं रहे

TCS News Network
इंदौर,14 April 2020
मध्यप्रदेश के मुस्लिम समाज की शान और राष्ट्रीय स्तर के इस्लामिक स्कॉलर मुफ़्ती-ए-मालवा मौलाना वलीउल्लाह सिद्दीक़ी नदवी साहब का इंतकाल (निधन) हो गया है।
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इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार ताहिर कमाल सिद्दीक़ी के वालिद (पिता) मुस्लिम समाज के बड़े धार्मिक विद्वान थे और मुस्लिम समाज की बड़ी असरदार शख्सियत और नामवर यूनानी हकीम (वैद्य)भी थे।यूनानी के क्षेत्र में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया के हाथों लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड और कई सम्मान उन्हें मिले।दौलत गंज एकता पंचायत की स्थापना और हिन्दू मुस्लिम एकता व भाईचारे के लिए भी उन्होंने बहुत योगदान दिया। कुछ दिन से तबीयत खराब थी।उनके इंतकाल की खबर मिलते ही प्रदेशभर के मुसलमानों में शोक छा गया है,जिसने भी उनके निधन की खबर सुनी रो पड़ा। आजादनगर कब्रस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया।उनके निधन पर अनेक लोगों ने खिराजे अक़ीदत पेश की।
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                 हज़रत से इरफान पठान मिलते हुए

मुफ़्ती-ए-मालवा की शख़्सियत का कोई नहीं सानी

बहुत से दिलों में उनकी जगह रोज़-रोज़ बनती आयी है..उनकी  पाक-साफ आवाज़ बहुत से लोगों ने बावजू सूनी,बहुत-सों ने बावजू नमाज़ की हालत में सुनी। यह शर्फ़ सिर्फ मुफ़्ती साहब के हिस्से में आता है।क़ुरआन व हदीस की रोशनी के हवाले से उनकी तक़रीर सुनने के लिए जुमे की नमाज़ रानीपुरा की कच्ची मस्जिद में घंटा भर भी कैसे गुज़र जाए पता नहीं चलता।कच्ची मस्जिद के ऐसे पक्के इमाम मुफ़्ती-ए-मालवा हज़रत मौलाना वलीउल्लाह सिद्दीकी साहब के पास इल्मो अदब का अपना खजाना था,शेरवानी और सर पर कपड़े से सिली मामूली टोपी उन के सर पर किसी ताज से ज़्यादा कीमती नज़र आती।
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सादगी की मिसाल मुफ़्ती साहेब को सुनते  तो ऐसा लगा लगता कि दीन दुनिया दोनों की खबर खूब रखते हैं। जो उनकी तकरीर सुनता उसके दिल का हर कोना साफ सुथरा,पाकीज़गी से मोअत्तर लगने लगता।उनके जुमले कभी समाज की आवाज़ बन जाते हैं और कभी परवाज बनकर मायूसी को दूर करते।समाज मे तालीम को लेकर हमेशा ज़ोर देते और बच्चों की हौसला अफजाई करते। अख़लाक़ किरदार का पैगाम हमेशा देते।समाज मे फैली रस्म रिवाजों और फ़िज़ूलखर्ची को रोकने के लिए बहुत कोशिश करते रहे।यही नहीं यूनानी के बड़े जानकार भी थे।बड़े हकीमों और वैद्यों में उनकी गिनती थी। पथरी और कई ऐसे मर्ज की जबरदस्त दवा और दुआ दोनों उनसे मिलती।उनकी ज़िंदगी मे गज़ब की पाबंदी और उसूल से भरी रही। सुबह 4.30 बजे सादिक़ से पहले  उठना,सुबह फजर की नमाज़ पढ़ाना, फिर सुरज की पहली किरण,चमकती ओस के वक़्त रानीपुरा से गांधी हाल तक तफरीह का सिलसिला। अज़ीम शख्सियत ऐसी जिनको  अपनेपन में डूबे लोगों ने क़ौम की अगुआई के लिए सिर माथे पर बिठा रखा है।वाक़ई उनका कोई सानी नहीं था।

 बुलन्दी पर पहुंचना कोई कमाल नहीं,
बुलन्दी पर ठहरना कमाल होता है।


हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है

 इंदौर।कुछ शख्सियत ऐसी होती है जिस पर सिर्फ एक खानदान,बिरादरी फ़ख्र करती है।मुफ़्ती-ए-मालवा हज़रत मौलाना वलीउल्लाह नदवी साहब ऐसी शख्सियत थी जिन पर पूरा समाज,पूरी मिल्लत फ़ख्र करती है, उन्होंने बेपनाह इज़्ज़त कमाई । मंगलवार की सुबह इंदौर और मालवा के मुसलमानों के लिए बहुत बड़ी ग़म की खबर लेकर आई। मालूम हुआ कि मुफ्ती-ए-मालवा साहब 85 साल की उम्र में इस दुनिया-ए-फानी को हमेशा के लिए अलविदा कर गए।मुफ़्ती साहब तबीयत ठीक नहीं थी  की सुबह उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। कहते हैं हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।मुफ़्ती साहब जैसी शख्सियत वाक़ई बेमिसाल थी।आपके इंतकाल की खबर जैसे ही शहर और शहर के बाहर चाहने वालों को मिली चारों तरफ माहौल गमगीन होता गया।